Tuesday, December 6, 2011

वफ़ा की उम्मीद..

1.
वह तो वक़्त ही बेहरम था, किसी और को क्या कहे,
जब मेरी महबूबा के पास, किसी और के लिखे ख़त मिले.....
2.
बहुत मुद्द्त हो गयी आपका दीदार किये हुए...
कि कल शाम देखा था आपको, हमारी गली से जाते हुए....
3.
गर मिले दोबारा जिंदगी में, तो अजनबी बन के रहना,
कि माही को तुमसे फिर कहीं वफ़ा की उम्मीद न हो जाये...

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