Tuesday, December 6, 2011

दिल के जख्म

1.
सबने समझाइश दी थी कि इश्क ना करना, माही को.....
अब खुद ज़माने को समझा रहे है कि इश्क एक गफलत है......
2.
वक़्त बे-वक़्त हम उनको सताया करते थे....
अब उनकी यादें वक़्त बे-वक़्त आ कर हमको रूलाया करती है....
3.
उन्हें संग दिल सनम क्यों कहे,वह तो खता माही ही की थी....
जब तलक हौसला आता, उनके हाथों में मेहंदी किसी और के नाम की थी....
4.
खुश तो वह भी नहीं रहते माही, जिन्हें उनका महबूब मिल जाता है....
फिर तुम इतने संजीदा क्यों हो, कि तुम्हे उनका इंकार मिला ...
जिंदगी में खुश रहने के लिए एक अफसाना ही काफी है...
कि कम से कम उनके जुबां पर नाम तो आया कि "माही तुमसे प्यार नहीं" .....
5.
कल हमने इस जहाँ की बुराइयों से नाता जोड़ लिया...
कि कम से कम अब आप हमें अपने दुश्मनों में तो गिनोगे....
6.
यूँ तो माही के फ़साने हज़ार हैं,
पर ज़ेहन में ख़याल उन्ही का रहता है!
सच ही कहता हें जमाना, कि बेवफाई भुलाना मुमकिन नहीं होता!!
7.
हर वक़्त जज्बात बयां करना आसान नहीं होता,
की महबूब से दिल ए हाल बयां करना मुश्किल होता...
वह तो वक़्त की मेहरबानी हो गयी माही पर...
की किसी ने महफिल में तारीफ हमारी करी और हया से उन्होंने निगाहे झुका ली ...

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