Tuesday, October 11, 2011

धोखा

गैरो से हर बार धोखा ही मिला, कि अपने पर से भी बिश्वास जाता रहा....
जिन्हें हम आज गैर कह रहे है, कल तक वह भी अपनों में ही शामिल थे...
हर रास्ता किसी न किसी मंजिल तक जाता है, ये भ्रम भी जाता रहा....
इतने भटके है इन राहों पर, कि मंजिल पाने का यकीन भी जाता रहा....
 हर शख्स को सुकून चाहिए, हमने भी खुदा से ऐसा चाहा  था.....
उसने दरो- दीवार तो बक्श दिए लेकिन छत देना भूल गया ...
मुद्दत से उनकी याद आ रही थी, सोचा आज मिल कर आया जाये...
वहां  पहुचे तो मालूम पड़ा कि एक अरसा पहले उनका  वक़्त किसी और का हो चुका ...
गैरो से हर बार धोखा ही मिला, कि अपने पर से भी बिश्वास जाता रहा....
होती है सभी से नादानियाँ इस ज़माने में, हमसे भी हुई थी एक बार...
ऐसी सजा ऐसी मिली कि हम दुआ करेगे कि रकीब को भी ऐसी सजा न मिले...
गैरो से हर बार धोखा ही मिला, कि अपने पर से भी बिश्वास जाता रहा....
काश वह हमें समझ पाते तो शायद जिदंगी में कुछ और बात होती...
उन्हें भी सुकून मिलता  और कुछ खुशियाँ भी हमारे दामन में होती........
जिनको समझाते रहे और गम साँझा करते रहे, हम दोस्त मान  कर......
एक दिन वह भी हमारे दुश्मनों की  फेरहिस्त में शामिल हो गए.........
गैरो से हर बार धोखा ही मिला, कि अपने पर से भी बिश्वास जाता रहा....

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